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VOL. 3, ISSUE 2 (2022)
पाश्चात्य उपन्यास-कला
Authors
डॉ० पूनम भारद्वाज
Abstract
प्रारम्भिक काल में नॉवेल के अन्तर्गत सामन्तों, स्त्रियों तथा पादरियों आदि को लक्ष्य बनाकर प्रेम तथा साहसिकता के कारनामों भरी कहानियाँ लिखी जाती थीं। इटली में इन कथाओं की सृजन प्रक्रिया का आरम्भ हुआ। उपन्यास में पहली बार मानव चरित्र के यथार्थ, व्यापक एवं गहन अध्ययन की संभावना देखने को मिली। अंग्रेजी साहित्य में कथा-साहित्य के लिए ‘फिक्शन’ शब्द का प्रयोग होता है। उपन्यास विशेष रूप से प्रायः मानवीय अनुभव का ही प्रतिनिधित्व करता है। यह यथार्थ अथवा आदर्श रूप में जीवन की व्याख्या करता है। उपन्यास की पूर्णता इस बात में है कि वह परिचित वस्तुओं और दृश्यों का चित्रण इस ढंग से करे कि वे सामान्य हो जायें। उनको पढ़कर पाठक को यथार्थ का भ्रम हो और उसी के रंग में रंग जाये। पाश्चात्य विद्वानों के मत में- उपन्यास मानव-जीवन की व्याख्या करने वाला ‘गद्यमय-आख्यान है तथा उपन्यास यथार्थ-जीवन की अभिव्यक्ति है। साहित्य में उपन्यास का वस्तुतः वही स्थान है, जो प्राचीन युग में महाकाव्यों का था। उपन्यास समाज की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करता हैै। उपन्यासकार के लिए कहानी साधन मात्र है, साध्य नहीं। उसका उद्देश्य पाठकों का केवल मनोरंजन करना नहीं है। वह सच्चे अर्थ में अपने युग का इतिहासकार है। जो सत्य और कल्पना दोनों का सहारा लेकर व्यापक सामाजिक जीवन की झाँकी प्रस्तुत करता है।
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Pages:13-15
How to cite this article:
डॉ० पूनम भारद्वाज "पाश्चात्य उपन्यास-कला". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 3, Issue 2, 2022, Pages 13-15
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