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VOL. 3, ISSUE 2 (2022)
पंथ-निर्माण
Authors
डॉ. सन्तोष कुमार पाण्डेय
Abstract
पंथ साहित्य, समाज और इतिहास से जुड़ा एक ज्वलंत विषय है लेकिन कवियों पर जितना चिंतन और शोध हुआ है, उतना पंथ पर नहीं। पंथ-निर्माण का प्रश्न हिंदी साहित्य से जुड़ा है। वैसे समाजशास्त्र का भी यह एक रोचक विषय हो सकता है। लेकिन आश्चर्यजनक है कि आज उस वर्ग के विद्वान जिनको भक्ति साहित्य में कुछ खास नहीं लगता और ऐसे विद्वान भी जो हर आधुनिक भाव बोध को भक्तिकाल में ही सिद्ध करने को उतारू रहते हैं, ‘पंथ’ के प्रश्न से मुंह मोड़ते हैं। वैसे नये-नये पंथों का चलन तो आज भी कभी-कभार सुनने को मिलता है पर प्राचीन काल और खासकर मध्यकाल में ये अनगिनत बने जो किसी न किसी रूप में आज भी चले आ रहे हैं। सहज जिज्ञासा उठ सकती है कि पंथ-निर्माण क्यों होते थे? यदि होते थे, तो विकृत क्यों हो जाते हैं? पंथ क्या स्वयं में बंधन नहीं होता? पंथ की यदि अपनी कुछ प्रतिबद्धताएँ होती हैं, तो कैसे और किसके पक्ष में या किसके विपक्ष में? कबीर को पंथ से जोड़कर देखने की जरूरत क्यों पड़ी? और आज उनको पंथ से अलग करके देखने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? पंथ के प्रतिष्ठापक, अपने पूर्ववर्ती पंथों की दुर्गति से सीख क्यों नहीं लेते? और अंत में, पंथ क्या सचमुच सिर्फ सत्तालोलुपता का पर्याय था या किसी गहरी ऐतिहासिक सांस्कृतिक जरूरत से विकसित होता था?
प्रस्तुत विषय तो अनेक पंथों या सम्प्रदायों के विवेचन की मांग करता है, पर सीमित अध्ययन के चलते, मैं कबीर पंथ को ही केन्द्र में रखकर चलूंगा। पंथ निर्मित तो होता है चन्द महीनों या वर्षों में लेकिन उसका क्षरण, अनवरत, शताब्दियों तक चलता रहता है। जाहिर है पंथ निर्माण में जितने तथ्य व जानकारी होती है उसके अधिक तथ्य व जानकारी उसके पतन में होती है। सम्प्रदाय सगुणों या सवर्णों द्वारा बनाए जाते थे, पंथ निर्गुणों या तथाकथित नीच जातियों द्वारा। वैसे यह कोई मान्य व वैज्ञानिक अलगाव नहीं है पर अक्सर देखने को यही मिला है। पंथ या सम्प्रदाय निर्माण हिन्दू धर्म की ही विशेषता या बुराई नहीं बल्कि यह सारे विश्व का मामला है। मुस्लिम या इस्लाम धर्म को ही ले लीजिए उसमें भी अनेक सम्प्रदाय हैं जैसे- चिश्ती सम्प्रदाय, सुहरवर्दिया सम्प्रदाय, कादिरी सम्प्रदाय, नक्शबन्दी सम्प्रदाय, शत्तारी सम्प्रदाय, कलन्दर सम्प्रदाय, लाल साहबाजिया सम्प्रदाय, मदारी सम्प्रदाय आदि, वैसे इनमें से अधिकांश शाखाएँ सूफी सम्प्रदाय की हैं। बौद्ध, जैन और भी न जाने कितने मूल परिवर्तनकामी शक्तियाँ ऐसे ही पंथों में विभाजित होकर अपनी धार को कुंठित कर बैठीं। ये प्रश्न विचारणीय है।
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Pages:23-26
How to cite this article:
डॉ. सन्तोष कुमार पाण्डेय "पंथ-निर्माण". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 3, Issue 2, 2022, Pages 23-26
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