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VOL. 4, ISSUE 2 (2023)
छायावादी राष्ट्रवाद का भाव-पक्ष
Authors
भास्कर लाल कर्ण
Abstract
छायावाद के मूल्यांकन में आलोचक कई तरह के सवाल उठाते रहे हैं। एक तरफ उस पर आध्यात्मिक होने का आरोप लगाया जाता है तो दूसरी तरफ उस काव्य को विशुद्ध कल्पना काव्य मान लिया जाता है, जहां प्रकृति का विशेष रूप से आग्रह हो। जबकि छायावादी कविता का आविर्भाव ही विद्रोह के रूप में हुआ था। कवियों ने कविता को छन्द के बन्धन से मुक्त किया, नये-नये विषयों द्वारा काव्य को संवारा, सांकेतिक एवं प्रतीकात्मक अभिव्यंजना तथा प्रकृति के नारी रूप में अंकन द्वारा इन कवियों ने श्रृंगार की स्थूल मांसलता का परिहार किया। इस युग में नारी माया की जगह सहधर्मिणी और सहयोगिनी बनी। साहित्य में भाव व विचार की गति राष्ट्रीयता के परिप्रेक्ष्य से आबद्ध हो विविध स्वर में उभर कर आगे बढ़ती रही है।
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Pages:3-5
How to cite this article:
भास्कर लाल कर्ण "छायावादी राष्ट्रवाद का भाव-पक्ष". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 4, Issue 2, 2023, Pages 3-5
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