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VOL. 5, ISSUE 1 (2024)
विद्यापति और उनका युग का ऐतिहासिक एवं विश्लेशणात्मक अध्ययन
Authors
प्रमिला
Abstract
विद्यापति संक्रमण काल के कवि है विद्यापति की रचनाओं पर इस संक्रमण का प्रभाव परिलक्षित होता है। उन्होंने चरित काव्य भी लिखे, शृंगार के पद भी लिखे और भक्ति में भी लीन हुए। संक्रमण काल के कवि होने के नाते विद्यापति का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। विद्यापति के समय में भारत में आमतौर पर दिल्ली सल्तन्त का षासन था। उनके जीवन काल में दिल्ली में तुगलक वंष और लोदी वंष का षासन रहा। विद्यापति-युगीन समाज सामंती समाज था। समाज, वर्ण, जाति और वर्ग में विभाजित था। आर्थिक और सामाजिक रूप से विपन्न लोगों का दमन और षोषण होता था। राजा, महाजन और व्यापारी सुखी थे। ‘कीर्तिलता’ में इस तथ्य का उल्लेख है कि हिन्दू-मुस्लमान साथ-साथ रहते थे। हिन्दू समाज में जाति व्यवस्था और विवाह पद्धति और भी विकृत हुई। एक तरफ धन था दूसरी और गरीबी। समाज में आर्थिक विषमता बहुत गहरी थी। दास की स्थिति बहुत खराब थी। किसानों की हालत कुछ बेहतर थी। विद्यापति की रचनाएँ खासकर कीर्तिलता, कीर्ति पताका, और पदावली अपने समय के जीवंत दस्तावेज है। मध्ययुगीन इतिहास लिखने में इनका सार्थक उपयोग किया जा सकता है।
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Pages:1-2
How to cite this article:
प्रमिला "विद्यापति और उनका युग का ऐतिहासिक एवं विश्लेशणात्मक अध्ययन". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 5, Issue 1, 2024, Pages 1-2
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