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Sanskritik aur Samajik Anusandhan
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VOL. 5, ISSUE 1 (2024)
महादेवी वर्मा की कविता में गीति-तत्तव
Authors
सुरेन्द्र कुमार
Abstract
महादेवी वर्मा छायावाद के चार आधार-स्तम्भों में से एक हैं। महादेवी की कविताओं में कुछ ऐसी विषेषताएॅ मिलती हैं कि जिसे छायावाद के किसी अन्य कवि में समाहित नहीं किया जा सकता। कल्पना-विधन, शब्द-रचना, प्रतीकात्मकता और शदों की विलोमात्मक संगति उनमें विषेष रूप से दिखायी देती है। इसके साथ ही तरलता, सहजता और तन्मयता जैसे गुण उनकी कविताओं के विषेष पहचान बन जाते हैं। नारी होने के कारण महादेवी वर्मा की लेखनी स्वाभाविक रूप से गीतिकाव्यात्मक है,क्योंकि महादेवी ने स्वयं अपने जीवन में सुख और दुख रूपी धूप-छाया को बहुत करीब से देखा और महसूस किया है। अतः उनके सुख और दुख के अनुभवों से उनकी लेखनी ने न जाने कितने गीतों को जन्म दिया। स्पष्ट है कि महादेवी की कविताएॅ और उनमें विद्यमान उनका गीति-तत्व इन सारे नियमें का वहन करता है तभी तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सरीखे आलोचक ने भी लिखा है-”गीत लिखने में जैसी सफलता महादेवी जी को हुई, वैसी और किसी की नहीं। न तो भाषा का स्निग्ध और प्रांजल-प्रवाह और कहीं मिलता है, न हृदय की ऐसी भाव-भंगिमा। जगह-जगह ऐसी ढली हुई और अनूठी व्यंजना से भरी पदावली मिलती है कि हृदय खिल उठता है।”7
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Pages:5-6
How to cite this article:
सुरेन्द्र कुमार "महादेवी वर्मा की कविता में गीति-तत्तव". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 5, Issue 1, 2024, Pages 5-6
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