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Sanskritik aur Samajik Anusandhan
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VOL. 5, ISSUE 2 (2024)
साहित्य, दृश्य और दृष्टि
Authors
डॉ. अनिल कुमार
Abstract
साहित्य की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। उसी तरह रचनाकार के चिंतन- मनन की क्रिया एवं रचना- प्रक्रिया भी सीमातीत मानी जाती है। ऐसे में साहित्य के विवेचन को भी किसी शास्त्र, विचारधारा अथवा सैद्धांतिक धारणाओं की सीमा में समेटा नहीं जा सकता। इसी गति के तहत पूर्ववर्ती धारणाओं का अतिक्रमण कर नई अवधारणों का जन्म होता है। साहित्य की समाजशास्त्रीय अवधारणा का आगमन भी इसी तरह होता है। जो साहित्य में उपस्थित दृश्य को सामाजिक चेतना से निर्मित दृष्टि के संदर्भ में देखते हुए उसे विश्वदृष्टि के आलोक में प्रस्तुत करता है। यह शोध आलेख उक्त प्रसंग में लूसिए गोल्डमान के योगदान को रेखांकित करते हुए साहित्य संबंधी दृश्य, दृष्टि और विश्व-दृष्टि की धारणाओं का विवेचन करता है।
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Pages:10-12
How to cite this article:
डॉ. अनिल कुमार "साहित्य, दृश्य और दृष्टि". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 5, Issue 2, 2024, Pages 10-12
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