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Sanskritik aur Samajik Anusandhan
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VOL. 5, ISSUE 2 (2024)
पुनरुत्थान की दुविधाएँ और अख़बार
Authors
डॉ. अनिल कुमार
Abstract
भारतीय इतिहास में अट्ठारहवीं सदी का अंतिम दौर एवं उन्नीसवीं सदी का पूरा दौर हलचल और कोलाहल से भरा हुआ संक्रमण काल की तरह रेखांकित किया गया है। चिंतन की धाराएँ भी संक्रमित हो रही थी। फलतः पुनरुत्थान की धारणा पुनरुत्थानवाद के रूप में एकरेखीय नहीं है। नवजागरण को भी धर्म आधारित विशेष राष्ट्रीयकरण के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। परम्परागत समाज व्यवस्था और पश्चिमी ज्ञान के सार एक दूसरे से टकरा रहे थे। विश्वास की दिशा एक तरफ़ और विज्ञान की दिशा दूसरी तरफ़। इसलिए सुधार आंदोलनों के नेताओं में समाज सुधारकों और पुनरुत्थानवादियों को अलग-अलग करके समझना ज़रूरी है। विशेषकर आर्यसमाज और थियोसॉफिकल सोसाइटी के संदर्भ में समाचार पत्रों की भूमिका के साथ प्रस्तुत शोध-आलेख में उस दौर के इसी द्वंद्वात्मक परिदृश्य को स्पष्ट करने की कोशिश की गई है।
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Pages:13-16
How to cite this article:
डॉ. अनिल कुमार "पुनरुत्थान की दुविधाएँ और अख़बार". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 5, Issue 2, 2024, Pages 13-16
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