बौद्ध संस्कृत काव्य परम्परा भारतीय साहित्य की एक विशिष्ट एवं हृदयस्पर्शी धारा है, जिसका मूल उद्देश्य मात्र काव्य सौन्दर्य या पाण्डित्य प्रदर्शन न होकर लोककल्याण एवं मानवोत्थान है। अश्वघोष, शांतिदेव, चन्द्रकीर्ति, नागार्जुन आदि महान बौद्ध कवियों ने अपने साहित्यिक सृजन को समाजोपयोगी संदेशों से परिपूर्ण किया। उन्होंने करुणा, शान्ति, मैत्री, भातृत्व, समत्व, दया और आत्मत्याग जैसे सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों को केन्द्र में रखकर काव्य रचनाएँ कीं। बौद्ध काव्यकारों की दृष्टि में संसार दुःखमय है तथा उसका कारण मोह, राग, द्वेष आदि क्लेश हैं। अतः इनसे मुक्ति दिलाने हेतु काव्य को एक साधन के रूप में प्रयुक्त किया गया। अश्वघोष की कृतियाँ बुद्धचरितम् तथा सौन्दरनन्द न केवल काव्य की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं, बल्कि इनमें धर्मोपदेश, इतिहास-बोध तथा सामाजिक संदेशों का भी समावेश है। उन्होंने लोक-परम्पराओं, व्यवहारों और सामाजिक चिन्तन को माध्यम बनाकर परमार्थ के सिद्धान्तों का उद्घाटन किया। बुद्धचरित में सिद्धार्थ के जन्म, त्याग, तपस्या और बुद्धत्व की प्राप्ति को आदर्श नायक के रूप में चित्रित किया गया है। वहीं सौन्दरनन्द में वैराग्य की ओर प्रवृत्त होने की प्रक्रिया को काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। बौद्ध साहित्य में शृंगार रस को गौण एवं शान्त रस को प्रधान माना गया है। जहाँ कालिदास व श्रीहर्ष जैसे कवियों ने शृंगार को मुख्य विषय बनाया, वहीं बौद्ध कवियों ने संयम, त्याग एवं शील को प्रतिष्ठा प्रदान की। जातकमाला, बोधिचर्यावतार, शून्यता सप्तति, तत्त्वसंग्रह इत्यादि ग्रन्थों में बोधिसत्व की करुणा, बुद्ध के उपदेशों की व्यवहारिकता तथा आत्मकल्याण-सहित लोककल्याण की महत्ता को रेखांकित किया गया है। बौद्ध काव्य की विशेषता यह भी है कि उसमें पांडित्य का प्रदर्शन नहीं, बल्कि भावात्मक संप्रेषण अधिक है। डॉ. रामायण प्रसाद द्विवेदी ने स्पष्ट किया है कि बौद्ध कवियों का काव्य न स्वान्तःसुखाय है, न ही लौकिक कामनाओं की पूर्ति के लिए। यह काव्य समाज में संतुलन लाने, दुःखी प्राणियों के दुःख निवारण की भावना से ओतप्रोत है। उन्होंने इसे अत्यधिक स्वाभाविक, सरल, गम्भीर, और कलापक्ष की अपेक्षा भावपक्ष में समृद्ध माना है।
इस काव्य परम्परा की तुलना यदि विश्व साहित्य की किसी भी परम्परा से की जाए, तो यह उसमें समता रखने में पूर्ण सक्षम है। यहाँ उपमाओं की अनुपमता, भाषा की सहजता, कथन की मधुरता और लोकजीवन की व्यापक अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
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