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Sanskritik aur Samajik Anusandhan
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VOL. 6, ISSUE 2 (2025)
वर्तमान भारत की आर्थिक नीति और दीनदयाल उपाध्याय का ‘स्वदेशी’ दृष्टिकोण : एक सामान्य विश्लेषण
Authors
डॉ. अखिलेश कुमार द्विवेदी, ओम प्रकाश गुप्ता
Abstract
भारत की आर्थिक नीतियाँ स्वतंत्रता के पश्चात् से ही निरंतर परिवर्तनशील और बहुआयामी रही हैं। प्रारंभिक दशकों में देश ने समाजवादी दृष्टिकोण से प्रेरित योजनाबद्ध विकास मॉडल को अपनाया, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुखता और मिश्रित अर्थव्यवस्था पर बल था। इसके पश्चात् 1991 के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। वर्तमान समय में भारत तीव्र आर्थिक विकास, वैश्विक निवेश, डिजिटलीकरण और अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय व्यापार के विस्तार के कारण विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। परंतु इस प्रगति के बावजूद गरीबी, बेरोजगारी, ग्रामीण-शहरी असमानता, कृषि संकट और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी चुनौतियाँ अब भी बनी हुई हैं। ऐसे समय में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का ‘स्वदेशी’ दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है। उपाध्याय जी ने अपने एकात्म मानववाद के दर्शन के माध्यम से यह प्रतिपादित किया था कि विकास का उद्देश्य केवल पूँजी संचय या भौतिक वृद्धि नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर अंतिम पंक्ति के व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति ही वास्तविक प्रगति है। उनका स्वदेशी विचार केवल आर्थिक स्वावलंबन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और नैतिक जीवन-दर्शन था। वे मानते थे कि भारत की आर्थिक नीति उसकी अपनी परंपराओं, संसाधनों और सामाजिक संरचना के अनुरू प होनी चाहिए। वर्तमान भारतीय आर्थिक नीति में ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे कार्यक्रम उपाध्याय जी के स्वदेशी दृष्टिकोण की प्रतिध्वनि करते हैं। ये पहल इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि यदि भारत को स्थायी और संतुलित विकास प्राप्त करना है, तो उसे अपने स्थानीय उद्योगों, कृषि, कुटीर उद्योगों और परंपरागत संसाधनों पर आधारित आत्मनिर्भर ढाँचे को सशक्त बनाना होगा। हालाँकि, वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के दबाव में इस दिशा में कई चुनौतियाँ सामने आती हैं। यह शोध पत्र वर्तमान भारत की आर्थिक नीति का सामान्य विश्लेषण करते हुए उसमें दीनदयाल उपाध्याय के स्वदेशी दृष्टिकोण की प्रासंगिकता को उजागर करता है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि आधुनिक वैश्विक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में स्वदेशी विचार किस प्रकार भारतीय नीति निर्माण को मार्गदर्शन दे सकता है। शोध पत्र इस निष्कर्ष की ओर संकेत करता है कि भारत की प्रगति तभी वास्तविक और स्थायी होगी जब उसकी आर्थिक नीति वैश्विक अवसरों को अपनाने के साथ-साथ स्वदेशी आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक अस्मिता को भी समाहित करे।
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Pages:10-13
How to cite this article:
डॉ. अखिलेश कुमार द्विवेदी, ओम प्रकाश गुप्ता "वर्तमान भारत की आर्थिक नीति और दीनदयाल उपाध्याय का ‘स्वदेशी’ दृष्टिकोण : एक सामान्य विश्लेषण". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 6, Issue 2, 2025, Pages 10-13
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