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VOL. 7, ISSUE 3 (2026)
बोल कि लब आजाद हैं तेरे : अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेमचंद साहित्य
Authors
डॉ. अनिरुद्ध कुमार
Abstract
आलेख सार- ‘सोजे वतन’ से गोदान तक का प्रेमचंद का तीन दशकों का साहित्य स्वतंत्रता, समानता और जीवन
के अधिकारों के उत्पीड़न और उनके खिलाफ संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है। इन सभी
संघर्षों में अभिव्यक्ति की आजादी की लड़ाई शामिल रही है। साम्राज्यवादी और सामंती
सत्ता के गठजोड़ के उस दौर में नागरिक अधिकारों का हनन आम बात थी। इसका उल्लेख भर
अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर पाबंदी लगाने की प्रक्रिया को शुरु कर देने वाला
था। ऐसे में अभिव्यक्ति के हनन के प्रयासों तथा इन प्रयासों के खिलाफ कभी
व्यक्तिगत कभी सामूहिक संघर्षों को रेखांकित करना अपने समय और समाज के प्रति जागरूक
और संवेदनशील प्रेमचंद के लिए अनिवार्य था। प्रेमचंद ने अभिव्यक्ति की आजादी हड़पने
की प्रक्रिया को बारीकी से रेखांकित किया है। वे सत्ता के विभिन्न उत्पीड़क तरीकों
को सामने ला सके हैं। उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष को भी रेखांकित किया और कई
संघर्षों को सफल होते भी दिखाया। राष्ट्रीय स्तर की बड़ी सत्ता के साथ ही परिवार
जैसी छोटी सत्ता में भी अभिव्यक्ति की आजादी छीने जाने को रेखांकित करने की क्षमता
ने प्रेमचंद के अभिव्यक्ति के लिए किए जाने वाले संघर्ष को पूर्णता के स्तर के करीब
पहुँचा दिया है।
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Pages:4-10
How to cite this article:
डॉ. अनिरुद्ध कुमार "बोल कि लब आजाद हैं तेरे : अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेमचंद साहित्य". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 7, Issue 3, 2026, Pages 4-10
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