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VOL. 3, ISSUE 2 (2022)
हरियाणवी लोक साहित्य में सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं का चित्रण
Authors
डाॅ. सुरेन्द्र कुमार
Abstract
किसी भी देश-प्रदेश और अंचल विशेष का साहित्य ‘कागद की लेखी’ नहीं अपितु ‘आँखिन की देखी’ का साहित्य होता है। उसमें ‘पोथियों का थोथा और कोरा ज्ञान नहीं अपितु प्रेम का पारावार हिलौरें मारता है। वह पंडिताई का नहीं अपितु प्रेम का प्रकटीकरण है। इसलिए लोक साहित्य की जड़ें बहुत गहरी और मजबूत होती हैं। वह हमारी सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर और संजोकर रखता है, उसको एक नई पहचान देता है और अपनी लोक परम्पराओं और लोक संस्कृति के प्रति एक रागात्मक और भावनात्मक लगाव पैदा करता है। लोक साहित्य हमारे जीवन और मौलिक संस्कृति का आधार तत्व रहा है। सही अर्थों में लोक साहित्य आम आदमी का, आम आदमी के लिए और आम आदमी के द्वारा रचित साहित्य है। इसलिए किसी भी युग का लोकसाहित्य उस युग के सामाजिक इतिहास का मौखिक दस्तावेज होता है। लोकसाहित्य पर जीवन संघर्षो की अमिट छाप होती है तथा वह जीवनधर्मी संकल्पों की विरासत भी है। हरियाणवी लोक साहित्य के अन्तर्गत विविध राग-रागणियाँ हरियाणा प्रदेश के विभिन्न अंचलों में निर्मित उस साहित्यनिधि का उद्बोधन कराते हैं जो यहाँ की कला, संस्कृति, लोकगाथा, लोककथा, लोकवार्ता, लोकगीत तथा लोकसम्बंद्ध परम्पराओं से संबंधित है। ‘हरियाणवी लोकसाहित्य’ निश्चय ही उस अगाध और विशाल महासमुद्र की भाँति अनंत मणिरत्नों से देदीप्यमान है, जो लोक परम्पराओं के निर्वहन और ग्रामीण अंचलों में जन चेतना के प्रसार में मील का पत्थर साबित हुआ है।
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Pages:16-19
How to cite this article:
डाॅ. सुरेन्द्र कुमार "हरियाणवी लोक साहित्य में सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं का चित्रण". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 3, Issue 2, 2022, Pages 16-19
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