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Sanskritik aur Samajik Anusandhan
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VOL. 5, ISSUE 1 (2024)
जयशंकर प्रसाद का राष्ट्रीय चिन्तन एवं स्त्री दृष्टि
Authors
कंवराज राम
Abstract
छायावाद काल का साहित्य रीतिकालीन साहित्य से इतर एक अलग रूप में उभरा। अंग्रेजांे के सम्पर्क में आने से देश में व्याप्त कुछ सामाजिक परम्पराएं एवं रूढ़ियाँ टूटती हुयी दृष्टिगोचर होने लगीं। देश की राजनैतिक सत्ता नरेशों से हटकर अंग्रेजों के हाथ में आ चुकी थी। छायावाद का समय गाँधी जी के नेतृत्व एवं राष्ट्र भावना के प्रसार का समय था जिसकी छाप जयशंकर प्रसाद के साहित्य पर स्पष्टतः देखी जा सकती है। 
प्रसाद जी के सम्पूर्ण साहित्य में राष्ट्रभक्ति एवं स्त्री के प्रति उदात्त भाव झलकता है। उनके समय में स्त्रियांे की दशा अत्यन्त दयनीय थी। इसी कारण आदर्श नारीत्व के प्रति संवेदना प्रायः उनके सभी नाटक, एकांकी एवं कहानियों में झलकती है। प्रसाद के नाटकों में नारी पात्र एक तरफ भावुक, त्यागशील, कर्तव्यपरायण, कोमल एवं उदार हैं तो दूसरी तरफ वे आत्म सम्मान के भाव से परिपूर्ण हैं। प्रसार स्त्रियांे से कोमल स्वभाव की अपेक्षा रखते हैं तथा आत्म सम्मान की रक्षा के लिए उनके हरसंभव विद्रोह की कामना करते हैं। उनके नारी पात्रों में नारी का नारीत्व, भाभीर्य, साहस एवं आत्म सम्मान के प्रति सजगता स्पष्ट झलकती है।
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Pages:11-13
How to cite this article:
कंवराज राम "जयशंकर प्रसाद का राष्ट्रीय चिन्तन एवं स्त्री दृष्टि". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 5, Issue 1, 2024, Pages 11-13
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