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VOL. 5, ISSUE 2 (2024)
हरियाणवी लोकवाद्यों का सांस्कृतिक मूल्यांकन
Authors
महासिंह पूनिया
Abstract
लोक वाद्य से अभिप्राय लोकजीवन में बजाए जाने वाले वाद्य हैं। हरियाणवी लोकजीवन में पारम्परिक लोक वाद्यों का शुरू से ही प्रयोग होता रहा है। यहां के लोग रागनी गायन के लिए माचिश का उपयोग वाद्य के रूप में करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त बालों के लिए प्रयोग किए जाने वाले कंघे को बजाने की परम्परा भी लोकजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। गांवों में बच्चों द्वारा आम की गुठली को घिसाकर पपीहा बनाने की परम्परा, गेहूं की नालियों को छेदकर उससे पिपनी बनाने की परम्परा, दो ठेगरों के बीच में पत्ता देकर उसे बजाने की परम्परा आज अतीत का हिस्सा बन कर रह गई है। रागनी में घड़वे का प्रयोग आज भी यहां के साजिन्दे करते हैं। हरियाणा में अनेक प्रकार के लोक वाद्यों का प्रयोग लोकजीवन में किया जाता है। गांवों में महिलाओं द्वारा नृत्य करते समय तालियों के माध्यम से ही वा हैं। गूगा के गीतों एवं मदारी द्वारा ड़मरू अथवा डुगडुगी का प्रयोग किया जाता है। डेरू लोक परम्परागत वाद्य है। इसका प्रयोग जोगी एवं गूगा के गायन में करते हैं। डफ आर्यों का प्राचीन वाद्य है। इसका प्रयोग होली गीतों एवं नृत्यों में किया जाता है। डफ़ली डफ़ का छोटा स्वरूप होता है। नृत्य के लिए सपेरे इस वाद्य यंत्र का प्रयोग करते हैं। खंजरी एक ऐसा लोक वाद्य है जिसमें झांझे लगी हुई होती हैं। व्यैक्तिक गायन एवं सामुहिक गायन के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। खड़ताल एक प्राचीन वाद्य है इसको करताल के नाम से भी जाना जाता है, जो लोक नाटकों एवं भजन-कीर्तनों में भी प्रयोग किया जाता है। घड़ा देसी लोक वाद्य है। इसका प्रयोग रागनियों, बीन एवं बांसूरी की स्वर लहरियों के साथ-साथ भजन-कीर्तन व लोक गायन शैलियों मेें किया जाता है। चिमटा वाद्य यंत्र कीर्तन एवं लोक सांस्कृतिक परिस्थितियों में प्रयोग किया जाने वाला वाद्य है। मंजीरा एक लोक प्रचलित वाद्य है जिसका प्रयोग लोक संगीत तथा भक्ति संगीत में किया जाता है। घूंघरू छोटे एवं बड़े आकार के वाद्य होते हैं। पशुओं के गले में भी मनोरंजन के लिए घूंघरू बांधे जाते हैं। लोक नृत्य में भी नृत्यकार घूंघरूओं का प्रयोग करते हैं। इकतारा प्राचीन लोक वाद्य है। यह एक तंत्री वीणा के समान है। इस वाद्य को भक्तजन भक्ति गीत एवं संगीत में ही प्रयोग करते हैं। सारंगी दो तरह की होती है। जोगिया सारंगी तथा धानी सारंगी। जोगिया सारंगी जोगियों द्वारा प्रयोग की जाती है जबकि धानी एवं बड़ी सारंगी का प्रयोग लोक गायन एवं लोक नाटकों में किया जाता है। बांसुरी को लोक जीवन में वंशी, मुरली आदि के नाम से जाना जाता है। इसका प्रयोग संगीत को मधुरता प्रदान करने एवं एकल मनोरंजन के लिए प्रयोग किया जाता है। अलगोजा अत्यन्त प्राचीन वाद्य है। एकल अलगोजा तथा जोड़ी अलगोजा दोनों ही लोक संगीत में प्रयोग किए जाते हैं। शहनाई यह वाद्य विवाह एंव मंगल अवसरों पर बजाया जाता है। शंख उद्घोषणा एवं आरती के समय बजाया जाता है। बीन लोक पारम्परिक वाद्य है जिसको सपेरा जाति के लोग लोक संगीत के साथ बजाते हैं। ताशा नगाड़े से मिलता हुआ वाद्य है। लोक संगीत में इसका प्रयोग किया जाता है। झांज अध्यात्मिक कार्यों एवं पूजा-पद्धतियों में प्रयोग किया जाने वाला लोक वाद्य है। इसके अतिरिक्त ‘‘लोकजीवन में माँदर, तूम्बा, तूम्बड़ी, सींगबाजा, चिकारा, मोहरी, फेफरया, मृदंग, मगज, छाती, ठीसकी, भूगडू, धार जाभवा, पवई, ठडक़ा, दफड़ा, खंजनी, किंदरा, शिवा, घोड़ी, रौदा, बिरला, पहरा, टंगनी, छुटका, रैंकड़ी, हिरकी, केंकरी, मुंचांग, करताल, टूंटड़ी, रमतुला, तुरही, खनखना, नकड़ेवन, लोटा, थाली, शिशी, मांदुरी, डुहकी, धनकुल, पिपनी, पत्ता, माचिस, चटकोला आदि लोक वाद्य लोकजीवन में प्रयोग किए जाते हैं।’’1
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Pages:1-2
How to cite this article:
महासिंह पूनिया "हरियाणवी लोकवाद्यों का सांस्कृतिक मूल्यांकन". Sanskritik aur Samajik Anusandhan, Vol 5, Issue 2, 2024, Pages 1-2
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